Emotional Short Story In Hindi अपने ही कमरे में अपने ही बिस्तर पर दुल्हन बनी बैठी ! 2025

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अपने ही कमरे में अपने ही बिस्तर पर दुल्हन बनी बैठी मैं कभी मुस्करा रही हूँ तो कभी शर्मा रही हूँ एक ही दिन में मेरी ज़िन्दगी इस तरह करवट ले लेगी ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही ना था आज सुबह तक जो दुल्हन का जोड़ा मुझसे पहना भी ना जा रहा था।

अभी वह मुझ पर कितना खेल रहा है और कल रात कल रात तक तो मैंने ना जाने कितनी बार अपनी किस्मत को कोसा था, लेकिन आज के पूरे दिन में जो कुछ भी हुआ वह सब कुछ बार बार मेरी नज़रों के सामने आ रहा है और मैं विश्वास ही नहीं कर पा रही हूँ।

कि कैसे मेरी किस्मत यूँ अचानक बदल गई है, मैं हूँ अवनी और आज भी मेरी शादी हुई है। सच कहूँ तो कुछ घंटों पहले मैं ये शादी नहीं करना चाहती थी लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद मुझे मेरी ज़िन्दगी की सारी खुशियां मिल गईं।

कानपुर के एक बड़े से मोहल्ले का छोटा सा मेरा घर कल रात किसी दुल्हन की तरह जगमगा रहा था। घर की छत से लेकर नीचे आंगन दरोदीवार सब कुछ लाइटिंग की रौशनी में खेल रहा था। पूरा घर मेहमानों से भरा पड़ा था और ये सब कुछ हो रहा था मेरे लिए।

घर की बड़ी बेटी के लिए है। माँ बाबू जी भी कितने खुश लग रहे थे और खुश होंगे भी क्यों नहीं उनकी बड़ी बेटी की शादी जो होने जा रही थी? पर क्या मैं इस शादी से खुश थी? इस सवाल का जवाब मैं खुद ही खुद को नहीं दे पा रही थी क्योंकि मेरा जवाब।

इस घर में जो तूफान ले आता, उसका सामना करने की हिम्मत मुझ में नहीं थी। रात के 11:00 बज चूके थे। सभी मेहमान अपनी अपनी जगह लेट कर बातों में लगे थे, लेकिन मैं मैं अपने कमरे की खिड़की से कभी उस छत को ताक रही थी।

जीस पर वह हर रोज़ टहलता हुआ दिखाई देता था तो कभी चाँद की उस चाँदनी को निहार रही थी जो उस वक्त मुझे सुहानी नहीं लग रही थी। मेरी बहन छोटी बैठ पर लेटी लेटी अपने मोबाइल पर पुराने गाने सुनते सुनते सो चुकी थी। उसके मोबाइल पर अभी भी गाना चल रहा था।

चांदनी रहते हैं, चांदनी रहते हैं सब जग सोये हम, जागे तारो से करे बाते वो चांदनी रहते हैं। कहीं ये गाना मेरे लिए ही तो नहीं लगाया था उसने थोड़ी देर पहले ही जब छोटी को मैंने अपने दिल की बात बताई थी तो कितना चौंक गई थी वह?

कहने लगी क्या दीदी कल आपकी शादी है और आप मुझे ये सब बता रहे हो। कौन है वो लड़का और कितने दिनों से ये सब चल रहा है? मैंने उससे कहा कुछ भी नहीं चल रहा है और कुछ चल भी नहीं सकता। मैं बस उसे पसंद करती हूँ और शायद वह भी।

कभी उसने अपने मुँह से कहा तो नहीं, लेकिन मैं समझती हूँ और जानती हूँ कि वह भी मेरे लिए, अपने दिल में कुछ जज्बात तो रखता है छोटी, लेकिन है कौन वो? मैंने कहा, वो सामने वाले मिश्रा अंकल है ना उनके यहाँ ऊपर वाले कमरे में?

किराये में रहता है। छोटी कौन वो लोतडू रैटर मैंने छोटी के बाल नोचते हुए कहा ये उसका नाम अवनीश है और ये क्या है रोतडू रैटर ऐसा क्यों कह रही हो? मैं लिखता है और अच्छा लिखता है। जानती भी हो कुछ।

छोटी हाँ हाँ पता है सारा मोहल्ला जानता है, तो क्या उसने कभी तुम्हें प्रोपोज़ नहीं किया, मैंने कहा नहीं अभी तो बताया कि उसने कभी नहीं कहा बस एक बार मेरा हाथ पकड़ा था और उस स्पर्श ने ही मुझसे सब कुछ कह दिया था छोटी।

तो आपने इस शादी के लिए हाँ क्यों कर दी? मैंने छोटी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, तुम तो जानती हो ना? बाबूजी को उनके सामने कुछ कहने की हिम्मत ना कर पाई मैं कभी छोटी तो फिर अब ये बातें करके क्या फायदा?

अब जब शादी के लिए हाँ कर ही दी है तो भूल जाओ उसे और प्लीज़ मुझे सोने दो। अब इतना कह कर छोटी तो अपने मोबाइल में गाने सुनते हुए सो गई थी और मैं मैं चाह कर भी अपनी आँखों को एक पल भी बंद नहीं कर पा रही थी। नींद तो मुझसे कोसों दूर थी।

मैं फिर से सामने वाली छत को निहारने लगी थी। क्या वह जानबूझकर आज अपने कमरे से बाहर नहीं आ रहा था? क्या उसे कोई फरक नहीं पड़ रहा था? ये जानकर की कल मेरी शादी हो जाएगी और मैं हमेशा के लिए इस मोहल्ले को छोड़कर चली जाऊंगी। क्या वह मुझसे प्यार नहीं करता था?

या वह केवल मेरा ही भ्रम था, लेकिन मुझे हाथों का स्पर्श आज भी याद है जिसने मेरे मन में एक हलचल सी मचा दी थी, उसका मेरी ओर देखने का वह अंदाज और अपनी कविताओं में किसी प्रिंसी के लिए लिखी गई वह भावनाओं क्या वह सब मेरे लिए नहीं था?

उस चाँदनी रात में अपनी शादी के 1 दिन पहले खिड़की के पास बैठी मैं उसकी और मेरी पहली मुलाकात के बारे में सोच रही थी। 1 दिन मैं घर के आंगन में रखे गमलों में पानी दे रही थी तभी देखा गेट पर कोई खड़ा अंदर ही झांक रहा था। जब मैंने आगे जाकर पूछा।

जी आप कौन और आपको किस्से मिलना है? जवाब में उसने कहा, मैं अवनीश उसका नाम सुनकर मैं चौंक गई थी। मैंने दोबारा पूछा क्या नाम है आपका? मेरा हैरान होना उसे शायद अजीब लगा था। उसने फिर से जवाब दिया जी अवनीश नाम है मेरा।

क्या आपके यहाँ कोई कमरा किराये से देना है? मैंने उससे कहा नहीं यहाँ कोई कमरा नहीं है, लेकिन आप सामने वाले मिश्रा अंकल के यहाँ पूछ सकते हैं। शायद उनके यहाँ एक कमरा खाली है। तभी माँ ने अंदर से आवाज लगाई अपनी कौन है बहार? मैंने उसकी ओर देखते हुए कहा।

कोई नहीं माँ कोई किराये का कमरा पूछने आया है। मेरा नाम सुनकर शायद उसे मेरी हैरानी की वजह पता चल गई थी। उसने कहा तो इसलिए मेरा नाम सुनकर आप हैरान चौंक गई थी। मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया तो वह चुप चाप मुस्कुराता हुआ।

मिश्रा अंकल के घर की ओर बढ़ गया था। पहली ही मुलाकात में जैसे हमारे नाम के साथ साथ हमारे दिल भी मिल गए थे। उसकी वह मुस्कराहट मुझे आज भी याद है। उसे मिश्रा अंकल के यहाँ कमरा मिल गया था। उसके बाद घर से बाहर आते जाते न जाने कितनी बार।

हमारी नजरें एक दूसरे से टकराती थी, लेकिन जुबान से कोई कुछ नहीं कहता था। धीरे धीरे उसके सरल स्वभाव और प्यारी सी मुस्कान ने पूरे मोहल्ले का मन जीत लिया था। मिश्रा आंटी जब भी घर पर आती थी, माँ से उसके बारे में कोई न कोई बात करती थी।

और मैं रसोई घर में काम के बहाने जाकर उसकी सारी बातें सुनती थी। मिश्रा आंटी जी से ही हमे यह पता चला की अवनि से एक अनाथ लड़का था। रिश्तेदार के नाम पर केवल एक मामा और एक मामी थे। उन्होंने भी उसके बड़े होते ही उसे यह कहकर घर से बाहर निकाल दिया।

कि अब वह खुद कमाकर खा सकते हो तो हम पर बोझ क्यों बने? उसी दिन अवनीश ने अपने मामा का घर छोड़ दिया था। अब जीवन यापन के लिए छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था। मिश्रा आंटी ने एक और बात बताई थी कि अवनीश बड़ी ही सुंदर कविताएं और कहानियों लिखता था।

बचपन से ही उसके अंदर एक बहुत बड़ा लेखक बनने की चाह थी। मैं धीरे धीरे अवनीश के हर एक गुण पर मर मिटने लगी थी। यह जानते हुए भी की इस पागलपन का कोई भविष्य ही नहीं था। मैं उसकी ओर आकर्षित हुए जा रही थी। अवनीश को भी शायद अपनी मजबूरी

और अपनी हत पता थी, इसलिए वह कभी भी मोहल्ले वालों के सामने अपने जज्बातों को जहर नहीं करता था। इस मोहल्ले ने उसे एक परिवार सा प्यार दिया था। मिश्रा अंकल और आंटी तो उसे अपने बेटे की तरह चाहने लगे थे। 1 दिन मिश्रा आंटी घर पर आई और माँ से कहने लगी।

मिश्रा जी ने कानपुर के पास ही कई खेती के लिए जमीन ली है। 2 दिन बाद हमने खेतों पर ही एक छोटी सी पूजा का आयोजन किया है। अब तुम तो मिश्रा जी को जानती ही हो। सारे मोहल्ले को निमंत्रण देने को कहा। तुम सबको भी आना है, ठीक है ना? सब साथ मिलकर चलेंगे।

पिकनिक भी हो जाएगी और पूजा का काम भी संपन्न हो जाएगा। उस दिन माँ ने भी जाने के लिए हामी भर दी थी। ये वही दिन था। जीस दिन मुझे अवनीश के जज्बातों का भी पता चला था, लेकिन उस दिन भी उसने साफ साफ शब्दों में कुछ नहीं कहा था। मिश्रा अंकल ने जब बताया।

की खेतों से थोड़ी दूर पर ही एक नदी बहती है तो हम मोहल्ले के कुछ लड़कियां और लड़के उस तरफ चल पड़े। मैं और छोटी पड़ोस की मीना दीदी के साथ चल रहे थे। तभी छोटी को आम का एक पेड़ नजर आया और हम लोग वहीं रुक गए। पेड़ काफी बड़ा था।

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उस पर चढ़ने का साहस तो हम में से किसी को भी नहीं था तो हम नीचे पड़ी बड़ी सी लकड़ी से कच्चे आम तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। जब बहुत देर बाद भी हमें कोई कामयाबी नहीं मिली तो हम आगे बढ़ने ही वाले थे। इतने में दो तीन लड़कों का ग्रुप हमारी और बढ़ा। उसमें।

अवनीश भी था। उसने आगे बढ़कर मेरे हाथ से लकड़ी ली और उछल कर आम की एक डाली पर्दे मारी। उसी के 7172 कच्चे आम नीचे आ गिरे। फिर वह इधर उधर देख नजदीक की दूसरी डाली ढूंढने लगा ताकि और आम तोड़े जा सके।

उसको देख सभी लड़कों में जोश आ गया। कुछ तो सीधा पेड़ पर चढ़ गए और देखते ही देखते हमने खूब सारे आम इकट्ठे कर लिए थे। अपनी झोली में खूब सारे आम लेकर हम नदी की ओर बढ़े। अनीस मेरे साथ साथ ही चल रहा था जब मैंने एक आम को साफ कर खाना चाहा।

तो उसने कहा रुको, रुको ऐसे नहीं नदी के पानी में धो कर फिर खा लेना। मैंने भी चुप चाप आम वापिस अपनी झोली में रख दिया और उसकी और देख कर चलने लगी। तभी सामने पांव में आए पत्थर को मैंने देखा ही नहीं और उसकी एक ठोकर से।

मेरी चुन्नी से बनी झोली के सारे आम नीचे गिर गए। मैं भी बस गिरने ही वाली थी। अगर अवनीश मुझे आगे बढ़कर थान न लेता तो जैसे ही उसने मुझे बचाने के लिए छुआ, मेरे तन मन में मानो एक बिजली सी दौड़ गई और मैं सहम कर पीछे हट गई।

अवनीश ने एक एक सारे आम उठाए और वापस मेरी चुनरी की झोली में भर दिए। तभी अचानक उसने कहा 1 मिनट अपना हाथ तो दिखाना ज़रा, मैंने भी मजाक में उसे कहा क्यों क्या तुम हस्तरेखा पढ़ने में माहिर हो? उसने मुस्कुराते हुए कहा, मुझे लगा।

की तुम्हारे हाथ पर कुछ लिखा है। बस इसलिए कह रहा था वैसे एक बात तुमने सही कही। मुझे थोड़ा बहुत हाथ पड़ना तो आता है। मैंने उत्साहित होते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया और उससे पूछा सच तो फिर बताओ मेरे हाथ में क्या लिखा है?

उसने मेरे हाथ को गौर से देखा और कहा, हाँ, तुम्हारी शादी किसी लेखक से होगी। मैंने अपना हाथ पीछे लेते हुए पूछा क्या क्या मतलब इसका उसने फिर अपनी कातिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा, हाँ, सच है, मगर घबराओ नहीं।

मेरे जैसे फटीचर लेखक से नहीं। तुम्हारी शादी तो किसी बेस्ट सेल्लिंग किताब लिखने वाले से होगी। मैं आगे बढ़कर उसे जवाब देना चाहती थी, लेकिन छोटी और मीना दीदी को अपने तरफ आता देख हम दोनों ही कुछ संभल गए थे। छोटी ने पूछा क्या हुआ दीदी?

गिर गई थी। क्या मैंने अवनीश की ओर देखते हुए कहा, नहीं, मैं नहीं आम गिर गए थे, लेकिन अवनीश ने मेरी मदद कर दी। चलो अब नदी की तरफ चलते हैं। उसके बाद वह पूरा दिन सबकी मौजूदगी के बावजूद हमने आँखों ही आँखों में बातें करते हुए।

गुजार दी थी। वह भी मुझे पसंद करता था। अफसोस केवल इसी बात का था कि उसने अपने जज्बातों को शब्दों का रूप नहीं दिया था। उस दिन के बाद मैं केवल इसी इंतजार में रही कि अपनी कभी तो अपने प्यार का इजहार करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

मैं अपने परिवार के अनुशासन के बोझ तले ऐसे दबी थी कि कभी मैं भी कुछ न कह पाई। कभी कभी सोचती थी क्या मुझे ही अवनी से बात कर लेनी चाहिए? लेकिन फिर यह सोचकर रुक जाती थी कि अगर हिम्मत करके कभी अवनी से बात कर भी लूँ और अगर उसने कहा।

की। उसकी तरफ से ऐसी कोई जज्बात थे ही नहीं, तो तो फिर मैं क्या करूँगी? बस इसलिए मैंने भी खामोशी को ही अपनाया था और जब 1 दिन घर में मेरे रिश्ते की बात चली तो मैंने अपने मन को समझा लिया था। यही सोचा कि शायद यही मेरी नियति थी।

उसके बाद सब कुछ बहुत जल्दी जल्दी हो गया। लड़के वाले मुझे देखने आए, शादी की तारीख भी निकल गई और मैं मैं मेरी शादी के 1 दिन पहले खिड़की से अब तक उसी की एक झलक के लिए तरसती रही। वह रात तो यूं ही आँखों आँखों में बीत गई।

सुबह जब माँ के कमरे में आई मेरी आँखों से उन्हें पता चल गया था कि मैं रात भर सोई नहीं हूँ। उन्होंने कहा, मैं समझ सकती हूँ, शादी के पहले ऐसा ही होता है, लेकिन घबराओ नहीं। सब ठीक होगा, दोपहर तक बारात यहाँ पहुँच जाएगी।

और शाम को मेरी लाडो का ब्याह हो जाएगा शादी का जोड़ा रख कर जा रही हूँ तुम्हारी सहेलियां आती ही होंगी, मेरी आँखें तुम्हें दुल्हन के रूप में देखने को तरस रही हैं। इतना कहकर उन्होंने मेरे माथे को चूम लिया था, मेरी आँखों में आंसू थे।

कुछ आंसू बहे थे मेरी अधूरी मोहब्बत के नाम तो कुछ आंसू अपने घर से बिछड़ने के गम में माँ ने नीचे जाने से पहले छोटी की ओर देखा। वह अभी भी सो रही थी। उन्होंने उसको उठाते हुए कहा देखो इसे घर में शादी है और महारानी घोड़े बेच कर सो रही है।

चलो दीदी को तैयारी में मदद ही कर दे। इतना कहते हुए माँ कमरे से बाहर निकल गई। देखते ही देखते बारात मेरे दरवाजे पर आ चुकी थी। पूरा मोहल्ला मेरी शादी में शिरकत करने को तैयार था। मेरी सहेलियों ने मुझे तैयार कर मेरे कमरे में ही एक जगह बिठा दिया था।

और खुद नीचे बारात को देखने चली गई थी। मैं कमरे में अकेली ही थी तभी मिश्रा आंटी का छोटा बेटा निशीथ मेरे कमरे में आया। उसने कहा दीदी अवनीश भैया ने ये चिट्ठी भेजी है। बस इतना कहकर वह भाग गया। अवनीश की चिट्ठी देख।

मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं। मैं मन ही मन उसे कोस रही थी। अब क्यों भेजी ये चिट्ठी? जब कहना चाहिए था तब तो कुछ कहा नहीं। मैं नहीं पढूंगी कुछ भी हो, मुझे अब जानना ही नहीं है। ऐसा सोच मैं उस कागज़ को फाड़ने ही वाली थी।

तभी मेरे दिल से आवाज आई एक बार देख तो लो क्या है? वरना जिंदगी भर पछतावा होगा कि आखिर क्या लिखा था अब इसने? मैंने उस कागज़ पर लिखे उसके जज्बात पढ़ना शुरू किया। प्रिय अपनी कहने की हिम्मत तो मैंने कभी की ही नहीं।

और आज तो मेरे पास इसका हक भी नहीं रहा। मैं जानता हूँ तुम मुझसे नाराज हो और ये भी जानता हूँ कि तुम्हें मेरी पहल का इंतजार था लेकिन मेरा यकीन करो अपनी मैं चाह कर भी ये कर ना सका। मेरी मजबूरियां ही मेरे पांव की भेड़िया हैं।

जिन्होंने हमेशा मुझे तुम तक गाने से रोका, मैं तुम्हें असीमित प्यार तो दे सकता हूँ लेकिन अफसोस है कि सिर्फ प्यार के सहारे इंसान इस दुनिया में जी नहीं सकता। मुझ जैसा एक अनाप एक फटीचर लेखक तुम्हें कोई खुशी नहीं दे पाएगा।

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मैं तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद नहीं करना चाहता और यही वजह है की मैंने चाह कर भी कभी अपने प्यार का इजहार तुमसे नहीं किया। आज तुम यहाँ से विदा हो जाओगी फिर कब मुलाकात होगी पता नहीं और मैं ये नहीं चाहता की तुम मुझे कायर समझोगे बस इसलिए एक तुम्हे लिख रहा हूँ।

पड़ते ही इसे जला देना। मेरी याद बनाकर इसे अपने पास संभालने की सोचना भी मत। तुम हमेशा खुश रहो यही कामना करता हूँ तुम्हारा अवनीश जो कभी तुम्हारा ना हो पाया अवनीश की वह चिट्ठी पर मेरी आँखों से आंसू बहने लगे। लाख कोशिशों के बावजूद।

मैं अपने अंदर समेटे बैठी उस तूफान को रोक नहीं पा रही थी, तभी छोटी मेरे कमरे में आई मेरी हालत देखकर कहने लगी बीबी क्या हुआ, क्यों रो रही हो? देखो तो मेकअप खराब कर दिया पूरा, मैंने उसे अपने हाथ का कागज़ थमाया।

एक नजर पड़ने के बाद वे कहने लगी, दीदी अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है। नीचे तुम्हारी बारात खड़ी है, भूल जा उसे छोटी ने मेज की दरार से एक माचिस निकाली और मेरी ही आँखों के सामने वह चिट्ठी जला दी। उस वक्त मुझे लगा जैसे वह कागज़ का टुकड़ा नहीं।

बल्कि मेरे सपने मेरा पहला प्यार मेरी चाहते सब कुछ उस कागज के टुकड़े के साथ जला रही थी, फिर छोटी ने मुझे पानी पिलाया, मेरा मेकअप ठीक किया। इतने में मेरी सहेलियां भी कमरे में आ गई। एक ने कहा, मुझे अब नीचे चलना होगा।

थोड़ी ही देर में रस्मे शुरू हो जाएंगी। मैं चुपचाप अपने कमरे से उठी और सहेलियों के संग नीचे उतरने लगी। नीचे उतरने से पहले मैंने सीढ़ियों से ही एक नजर चारों ओर घुमाई। मोहल्ले का हर शख्स वहाँ मौजूद था और अवनीश भी मैंने देखा।

अपनी मेरी ओर ही देख रहा था। एक पल के लिए हमारी नजरें टकराई और उसने नजरे नीचे कर लीं। उसके बाद जैसे मैं अपनी सुगबुध गंवा चुकी थी। बस अंतर्गत अब मुझे शादी की रस्में निभानी थी। मैं धीरे धीरे नीचे उतरने लगी।

नीचे आते ही माँ ने मेरी नजर उतारी और मुझे शादी के मंडप तक ले गए। मैं बस अपनी जगह आकर बैठ गई। पास ही मेरा होने वाला धूला बैठा था। सामने पंडित जी तैयारी में लगे हुए थे। थोड़ी देर में पंडित जी ने मेरी माँ से कहा कि कन्या के पिताजी को बुलाइए।

माँ बाबूजी की ओर बढ़ी तो उसी वक्त मैंने देखा बाबूजी मेरे होने वाले ससुर जी से कुछ बात कर रहे थे, उनकी बातचीत मैं ठीक से सुन नहीं पा रही थी लेकिन देखने से पता चल रहा था कोई परेशानी की बात तो थी। मेरे होने वाले ससुर बहुत गुस्से में दिखाई दे रहे थे।

और बाबूजी का चेहरा मुरझाया सा लग रहा था। मैंने पास की खड़ी छोटी को इशारे से अपने पास बुलाकर पूछा कुछ हुआ है क्या? बाबूजी ने परेशान क्यों लग रहे हैं? छोटी ने कहा पता नहीं मैं जाकर देखती हूँ छोटी उन तक पहुंचती।

उससे पहले ही वह दोनों अंदर के कमरे में चले गए। जब माँ से पूछा दोनों ने ये कहकर बात टाल दी कि कुछ जरूरी बात करने दोनों अंदर के कमरे में गए हैं, बस अभी आते ही होंगे। इतना कहकर वह भी अंदर चली गई। लगभग 1520 मिनट गुजर चूके थे।

हम दोनों किसी भूत की तरह चुपचाप मंडप में बैठे थे। मेरे पास ही खड़े कुछ लोग आपस में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे। उनकी फुसफुसाट मुझे साफ सुनाई दे रही थी। क्या बात हो गई लड़के के पिताजी नाराज हो गए। लगता है दूल्हा दुल्हन मंडप में तैयार बैठे हैं।

और माता पिता का पता नहीं। जरूर कोई कुछ तो हुआ है वरना ऐसे भी कोई करता है भला? ऐसी ही तरह तरह की बातें मेरे कान में पड़ रही थी। मेरा मन बहुत घबरा रहा था। कहीं किसी ने मेरे दिल की बात लड़के के माँ बाबूजी को तो नहीं बता दी होगी?

मेरे मन में तरह तरह के ख्याल आ रहे थे, लेकिन ऐसा होना मुमकिन नहीं था। मैंने तो सिवाय छोटी के और किसी से भी इसका जिक्र नहीं किया था। फिर क्या बात हुई होगी? मैंने चोरी से एक नजर अपने होने वाले पति पर डाली। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

मैं भी शायद इस बात से अनजान थे की आखिर वहाँ क्या हो रहा है या फिर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था? इस बात से मेरा बैचेन मन, बस माँ, बाबूजी की ओर लगा था। मुझे लग रहा था अभी भाग कर जाऊं और पूछ लू आखिर क्या बात हुई है? पर मैं अपनी हद जानती थी।

एक दुल्हन का ऐसा बर्ताव शायद किसी को भी पसंद नहीं आता। तभी अचानक मेरे होने वाले ससुर जी गुस्से में तमतमाते हुए मंडप की ओर आए और अपने बेटे से कहने लगे उठो बेटा राजीव, अब यहाँ कोई शादी नहीं होगी, ऐसे लोगों से क्या नाता जोड़ना?

जो अपने जुबान के पक्के ना हों। इतना सुनते ही उनका आज्ञाकारी बेटा झट से मंडप में से उठकर उनके पास जाकर खड़ा हो गया। उनके इतने कठोर बोल सुनते ही मैं भी अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई। मैंने देखा माँ और बाबू जी मंडप के पास आ गए थे।

बाबूजी पसीने से लथपथ भरे हुए थे, उनके हाथ में एक बैग था और माथे पर ढेर सारी परेशानी माँ की आँखों में आंसू थे। वह लगातार दूल्हे की माँ के हाथ पकड़कर कुछ कहे जा रही थी, लेकिन मेरी होने वाली सास उनकी बात भी नहीं सुन रही थी।

अपने माँ बाबूजी की ऐसी हालत देख मैंने हिम्मत करके आगे बढ़कर माँ से पूछा माँ आखिर क्या हुआ है? आप रो क्यों रही हैं? उन्होंने मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, कुछ नहीं बेटा, सब ठीक हो जाएगा। तभी दूल्हे के पिता ने कहा।

अब कुछ ठीक नहीं होगा। सीमा जी अब ये शादी नहीं होगी। आपने कहा था फेरे पड़ने से पहले पूरे 5,00,000 कॅश हमारे हाथ में देंगे और अब ये आपके धोखेबाज पति साढ़े 4,00,000 में ही सब निपटाना चाहते हैं। ऐसा नहीं चलेगा हमारे साथ।

उनके मुँह से 5,00,000 की बात सुन मेरे पांव के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई थी, मेरी शादी के लिए दहेज दिया जा रहा था। यह बात तो मुझे दहेज पता ही नहीं थी। मैंने सवालों भरी नजरों से अपने माँ बाबू जी की ओर देखा।

कितनी सफाई से उन्होंने मुझसे ये बात छुपा कर रखी थी। मेरे बाबूजी ने दूल्हे के बाबूजी से धीमी आवाज में कहा भाई साहब मेहमानों के सामने ये सब बात मैंने आपसे कहा, मैं अपना वादा पूरा करूँगा, बस ये शादी हो जाने दीजिए और मुझे थोड़ी मोहलत दे दीजिए।

50,000 की ही तो बात है, मैं जल्द से जल्द उनका इंतजाम कर लूँगा। आप ये बाकी रकम स्वीकार करके मेरी बेटी को अपना लीजिए। देखिए सब देख रहे हैं खामखा तमाशा बन जाएगा आप ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए दूल्हे के पिता ने पैसों का बैग।

बाबूजी की ओर करते हुए कहा, तमाशा तो आप कर रहे हैं, अभी तो बेटी विदा भी न की और ये हाल है आगे क्या खाक रिश्तेदारी निभाएंगे। अब रखी है अपनी बेटी अपने पास, हम तो चले चलो भाई बारात वापस ले चलो।

न जाने किन फटीचरों से पाला पढ़ गया। उनके इतना कहते ही चारों ओर जैसे अफरा तफरी मच गई। मोहल्ले वाले आगे आकर बारातियों को समझाने लगे। बाबूजी लगातार दूल्हे के पिता को मनाते रहे। मेरी माँ ने रोते बिलखते हुए कहा देखिए।

ऐसे अगर बारात लौट जाएगी तो मेरी बेटी का क्या होगा? हमारी बहुत बदनामी हो जाएगी, उससे कौन शादी करेगा? फिर नौबत यहाँ तक आ गई की मेरे बाबूजी उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। इससे ज्यादा बर्दाश्त करने की ताकत मुझमें नहीं थी।

मैंने आगे बढ़कर अपने बाबूजी के दोनों हाथ थाम लिए और उनसे कहा, नहीं बाबूजी, अब और नहीं, बस बहुत हुआ। इन लोगों को जाने दीजिए, मैं खुद भी अब इस शादी के लिए राजी नहीं हूँ। आप तो शुक्र मनाइए कि आपकी बेटी ऐसे लालची लोगों के घर में जाने से बच गई।

इन जैसे लोगों की भूख कभी नहीं मिटती। इनसे रिश्ता जुड़ने से पहले ही टूट गया तो समझिये आपकी बेटी बच गई, वरना हो सकता था किसी दिन आपको मेरी जली लाश ही मिलती जाने दीजिये। इन्हें मेरी बात सुन सारे बारातियों ने एक पल में ही हमारा आँगन खाली कर दिया।

पीछे रह गए थे तो मेरे मोहल्ले वाले और मेरे रोते बिलखते माँ बाबूजी थोड़ी देर पहले तक जो आंगन शादी की सेनाईयों से गूंज रहा था, वह किसी मातम सा माहौल छा गया था। मैंने अपने बाबूजी को इस हालत में कभी नहीं देखा था। हम सब तो कितना डरते थे उनसे?

लेकिन आज वे जमीन पर बैठकर किसी नन्हे बच्चे की तरह रो रहे थे। मैंने उनके आंसू पोछते हुए कहा वह लोग तो पराये थे, उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं है बाबूजी, लेकिन आपने ऐसा क्यों किया? क्यों इतनी बड़ी बात हम सबसे छिपाई? जब उन्होंने दहेज की मांग की थी।

तभी आपने इस रिश्ते के लिए मना कर देना चाहिए था। क्या आपकी बेटी आपके लिए इतना बड़ा बोझ बन गई है की आपने यूं से पैसे के साथ विदा करना चाहा? मेरी बातें सुन बाबू जी और भी टूट गए थे। माफी पास ही बैठी उनके आंसू तो पोंछ रही थी।

लेकिन खुद रोए जा रही थी। भाई मिश्रा अंकल ने उन्हें संभाले हुए कहा प्रताप भाई आपकी बेटी 16 आने सच कह रही है, आपको तो गर्व महसूस होना चाहिए। अपनी बेटी पर अपनी अपनी बिटिया तो खरा सोना है। सोना इन लुटेरों के हाथों से बच गई समझो।

मेरे बाबूजी ने कुछ संभाले हुए मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा ये सब तो ठीक है मिश्रा जी, लेकिन आज जो भी कुछ हुआ उस बदनामी की काली छाया मेरी बेटी का पीछा नहीं छोड़ेगी। अब उसकी बारात तो लौट गई, अब कौन उसे अपनाएगा? मिश्रा अंकल?

ये सब तो कहने की बातें हैं। हो सकता है इससे भी अच्छा लड़का हमारी अपनी के नसीब में लिखा हो। आप परेशान क्यों होते हैं? आइए उठिए मिश्रा अंकल ने मेरे बाबूजी को उठाया, पास ही रखी है, कुर्सी पर बिठाया और पानी पिलाया। अभी बाबूजी पानी पीकर समले ही थे।

की अचानक मोहल्ले की भीड़ से अवनीश सामने आया। अभी तक जो कुछ भी हुआ था, उस बीच में अवनीश को तो बिलकुल भूल ही गई थी। मैं भूल गई थी की जो कुछ भी वहाँ हो रहा था, अवनीश भी तो सब कुछ देख ही रहा होगा। अचानक भीड़ में से अवनीश का यूं मेरे सामने आना।

मुझे अंदर तक डरा रहा था। कुछ देर पहले ही तो मेरे परिवार पर गमों का एक पहाड़ सा टूट पड़ा था और अब अवनीश उसे देखते ही एक बार फिर से मेरे मन में एक साथ कई सवाल उमड़ पड़े थे। ना जाने भय अब क्यों इस तरह सबके सामने आया था?

आखिर करना क्या चाह रहा था? वह अवनीश मिश्रा अंकल और बाबूजी के पास जाकर खड़ा हो गया। उसे देखते ही मिश्रा अंकल ने पूछा अरे अवनीश तुम कुछ काम था क्या? अवनीश ने कहा, मिश्रा अंकल मैं प्रताप अंकल से कुछ बात करना चाहता हूँ।

मिश्रा अंकल ने उससे कहा, देखो बेटा अभी यहाँ माहौल कुछ ठीक नहीं है, तुम्हे अभी ऐसा क्या काम आना पड़ा है? तुम अपनी बात बाद में कर लेना ठीक है, जाओ बेटा बाद में आना। मैं अवनीश की ओर ही देख रही थी।

उसकी आँखों में अजीब सी चमक को मैं महसूस कर सकती थी जैसे कोई बहुत बड़ा फैसला उसने कर लिया हो। अवनीश ने मिश्रा अंकल की बात सुन उनसे कहा, नहीं अंकल बाद में नहीं, जो बात मुझे करनी है वह अगर अभी नहीं की तो जिंदगी में दोबारा शायद कभी नहीं कर पाऊंगा।

के मुँह से बे सब सुन बाबूजी ने उसे कहा कहो बेटा अवनीश क्या कहना चाहते हो? बाबूजी कुर्सी पर बैठे हुए थे। अवनीश उनके पांव के पास जाकर बैठ गया और उनकी ओर देख कर कहने लगा, बाबूजी उसके मुँह से अपने लिए बाबूजी सुन।

मेरे बाबूजी कुछ हैरान तो हो गए थे, लेकिन उनके कुछ कहने से पहले ही अपनी इसने फिर से अपनी बात कहना शुरू किया। पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिए बाबूजी मैं जानता हूँ आपसे कुछ भी कहने का यह उचित समय नहीं है, लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा।

मैंने अगर आज ये बात आपसे नहीं की तो फिर कभी मैं इसकी हिम्मत दोबारा नहीं कर पाऊंगा। आप तो जानते है मैं एक अनाथ हूँ जिसका इस दुनिया में कोई नहीं है। हाँ कहने को एक मामा है जिनके लिए मैं एक बहुत से ज्यादा कुछ नहीं था जो उन्होंने कई बरसो पहले ही।

अपने कंधे से उतार फेंका। अगर आज मेरे पास अपना कहने को कोई है तो भाई ये मोहल्ला और इस मोहल्ला के लोग ही हैं। अब यही मेरा परिवार है। अभी थोड़ी देर पहले आप मिश्रा अंकल से कह रहे थे की अब बदनामी की काली छाया आपकी बेटी का पीछा कभी नहीं छोड़ेगी।

क्योंकि उसकी बारात लौट गई। अब कौन उसे अपनाएगा? तो तो मैं आपसे कहना चाहता था की अगर आप ठीक समझे और अपनी कभी हाँ हो तो मैं आपको इस मोहल्ले को साक्षी मानकर आपकी अपनी को अपनाना चाहता हूँ।

उसे अपने जीवन संगनी बनाना चाहता हूँ। अवनीश के मुँह से वह बात सुन, बाबूजी, मैं और वहाँ मौजूद हर एक शख्स जैसे एक पल के लिए बूथ बन गए। फिर जब बाबूजी को अचानक उसकी बात समझ आई तो वे अपनी जगह से उठते हुए लगभग चीख पड़े क्या?

ये क्या कह रहे हो तुम? अवनीश मैं जानता हूँ आप यही सोच रहे हो ना की हाँ, मैं खुद एक फटेहाल की जिंदगी जी रहा हूँ और कैसे मैं अवनी को खुश रख पाऊंगा? लेकिन बाबूजी मेरा यकीन कीजिए मैं अवनी को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूंगा।

अभी भले ही मैं बच्चों को पढ़ाकर अपना जीवन यापन कर रहा हूँ लेकिन मैं जल्द ही कोई नौकरी ढूंढ लूँगा। बाबूजी, आज यहाँ जो कुछ भी हुआ मैं बस उसे ठीक करना चाहता हूँ। अवनीश की बात सुन बाबूजी गुस्से से आग बबूला हो चूके थे। उन्होंने मिश्रा अंकल को देखते हुए कहा।

देखा मिश्रा जी आपने ये होता है जब एक लड़की की बारात उसके दरवाजे से बिना ब्याह के लौट जाती है। हाँ यही होता है कोई भी आकर अपने मुँह पर कालिख पोत जाता है। इस लड़के की हिम्मत तो देखो अभी तो लड़के वाले मोहल्ले से बाहर भी ना निकले होंगे।

और चला आया ये अपना मुँह उठाये कहता है मैं आपकी बेटी को अपनाना चाहता हूँ। अरे भाई क्या बेटी हमारी बोझ है? हम पर नाजों से पाला है और इसलिए चाहते थे कि चाहे कुछ भी करना पड़े, लेकिन अच्छे से अच्छा रिश्ता ढूंढ कर लाएंगे अपनी बेटी के लिए।

लेकिन हमारी किस्मत देखो बेटी की बारात क्या लौट गई? गली का कोई भी लड़का आकर हमसे ऐसी बात करने की जुर्रत कर रहा है और तुम अपनी हम तो तुम्हें होन और लड़का समझते थे, लेकिन क्या तुम हमारी बेटी के बहाने हमारी इस परिस्थिति का फायदा उठाना चाहते हो? अपनी?

बाबूजी आप मुझे गलत समझ रहे हैं, मैं सच में अपनी को चाहता हूँ और उसे अपनी पत्नी बनना चाहता हूँ। मैं खूब मेहनत करूँगा। आपकी बेटी का हर वह सपना पूरा करूँगा जो आपने उसके लिए देखा है। आपके आशीर्वाद के अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

अवनीश की बात सुन मिश्रा अंकल ने अवनीश का हाथ पकड़ा, उसे एक तरफ ले गए और उससे कहा, अवनीश बेटा, ये तुम क्या कर रहे हो? अवनीश मिश्रा अंकल मैं सच कह रहा हूँ, आज यहाँ जो कुछ भी हुआ बस उसके लिए ही नहीं।

बल्कि मैं तो बहुत पहले से ही अपनी से प्यार करता हूँ, मगर मैं अपनी हैसियत भुला नहीं था इसलिए चुप था, लेकिन आज के बाद मेरी अपनी कोई और दुख देखे। यह मैं कैसे होने दूँ? और मेरा यह प्यार एक तरफ़ा नहीं है, अपनी भी मुझे चाहती है।

आप चाहे तो अवनी से पूछ लीजिए प्लीज़ अंकल आप तो मुझे अपने बेटे के समान मानते हैं ना, तो अपने बेटे की मदद कीजिए और बाबूजी को समझाइए। प्लीज़ प्लीज़ अवनीश की बात सुन मिश्रा अंकल ने मेरी ओर देखा।

मैं अब तक एक मूर्ति की तरह खड़ी होकर सब कुछ सुन रही थी। अंकल ने जैसे ही मेरी ओर देखा, मुझे उनकी आँखों में एक सवाल दिखा जैसे पूछ रहे हों, क्या अपनी सच कह रहा है? मैंने एक पल भी न गंवाते हुए धीरे से अपनी गर्दन हामे हिलाई और नजरें नीचे कर लीं।

अब हम दोनों का भविष्य मिश्रा अंकल के हाथ में था। हम जानते थे एक भाई है जो बाबूजी को इस शादी के लिए मना सकते थे। मिश्रा अंकल मेरे बाबूजी के पास गए और उन्हें धीरे से कहा, देखिए प्रताप भाई, ये आपका एक निजी मामला है।

की आप किस्से अपनी बेटी की शादी करवाना चाहते हैं लेकिन हम सब इस मोहल्ले में कई बरसों से एक परिवार की तरह रहते आ रहे हैं और उसी की वजह से एक बात मैं आपसे कहना चाहूंगा अवनी से सुलझा हुआ लड़का है, ये उसकी बदकिस्मती है।

की उसके पास घर परिवार कुछ नहीं है। मगर क्या अभी आपने सुना उसने इस मोहल्ले को ही अपना परिवार बताया है। अभी थोड़ी देर पहले तक तो आप खुद ही उसे एक होनहार लड़का समझ रहे थे, मगर जैसे ही उसने आपकी बेटी का हाथ थामना चाहा वह गली का एक आवारा लड़का बन गया।

मैं ये नहीं कहता कि बिना कुछ सोचे समझे अवनी की बात मान लीजिए लेकिन एक बार आप अपनी बच्ची अवनी से भी पूछ लीजिए। हो सकता है उसे भी ये रिश्ता पसंद हो और रही बात घर जायदाद और परिवार की तो आपने अभी अभी देखा।

की इन सब चीज़ो के होने के बावजूद हमारी बेटी तो बिन ब्याही ही रह गई। मैं अपनी को अपने बेटे की तरह मानता हूँ। आप ये समझिए की आप अपनी बेटी का रिश्ता मेरे बेटे से करने जा रहे हैं। जब तक अपनी के हालात सुधर नहीं जाते, आपकी बेटी को मैं अपनी बेटी की तरह संभालूंगा।

प्रताप भाई जोड़ियां तो ऊपर से ही बनकर आती हैं, हम चाहे कुछ भी कर ले अगर दोनों बच्चों का भाग्य एक दूसरे से जुड़ा है तो हम तो बस एक जरिया है। आप बस एक बार मेरी बात पर गौर कीजिए, मैंने देखा।

अंकल की बात सुन बाबूजी के चेहरे के भाव धीरे धीरे कुछ बदलते से दिखाई दिए। उनका गुस्से से तमतमाता चेहरा अब शांत लग रहा था। उन्होंने एक नजर पास ही खड़ी मेरी माँ की ओर देखा। वह मिश्रा आंटी के हाथ थामे खड़ी थी। आँखों में आंसू थे लेकिन ये कह पाना मुश्किल था।

के आंसू गमके थे या खुशी के फिर बारी मेरी थी, मैं बाबू जी से नजरे नहीं मिला पा रही थी झुकी हुई गर्दन लिए मैं धीरे धीरे बाबू जीके पास आई, उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा उसके बाद न जाने कहाँ से मुझ में भी कुछ हिम्मत आ गई।

मैंने अपनी झुकी गर्दन उठाई और बाबूजी की आँखों में देखते हुए कहा बाबूजी अगर आप और माँ आशीर्वाद दे तो मैं भी अपनी से शादी करना चाहती हूँ लेकिन आपका दिल दुखाकर मैं कुछ नहीं करना चाहती मेरे मुँह से ये बात सुन बाबूजी ने कहा, बेटी।

माँ बाप तो बस अपनी औलाद का भला चाहते हैं, तुम खुश हो तो फिर हमें और क्या चाहिए? बाबूजी ने अपनी की ओर देख उसे अपने पास बुलाया और नम आँखों से हम दोनों को एक साथ गले लगाया। अपने बाबूजी का यह रूप मैंने पहली बार देखा था, मैं बहुत खुश थी।

मैंने चुपके से अपनीश की ओर देखा, वह मुस्करा रहा था, उसकी मुस्कराहट देख मैं भी मुस्करा रही थी। साथ ही आँखों में आंसू भी आ गए थे। उसके बाद तो पूरे मोहल्ले बालों ने हमें घेर लिया और शुभकामनाओं की जैसे बारिश सी हम पर हो गई। फिर मिश्रा आंटी ने।

अवनीश को अपने साथ चलने को कहा और जाते जाते। वह मेरी माँ से कह गई, सीमा अब तो समधन बनने जा रही हो, खूब अच्छे से खातिर करवाऊंगी। मैं आ रही हूँ अपने बेटे की बारात लेकर तुम तैयारी कर लो और हाँ आज रात बारात यही रुकेगी।

तुम्हारे आंगन फिर कल सुबह विदाई होगी। उनकी बात सुन माँ कितनी ज़ोर से हंस पड़ी थी। उसी शाम मैं और अवनीश अपने परिवार को अपने मोहल्ले को और अग्नि को साक्षी मानकर एक हो गए थे और अब देखो अपने ही कमरे में, अपने ही बिस्तर पर।

दुल्हन बनी बैठी मैं कभी मुस्करा रही हूँ तो कभी शर्मा रही हूँ। एक ही दिन में मेरी जिंदगी इस तरह करवट ले लेगी और मैं अपने प्यार का इस तरह इसी सजी हुई स्टेज पर इस तरह इंतजार करूँगी ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही ना था।

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